श्री हनुमान बाहुक मराठीत | Hanuman Bahuk in Marathi Lyrics, Meaning, Download PDF

मराठीमध्ये संपूर्ण श्री हनुमान बाहुक पाठ करा आणि त्याचा संपूर्ण अर्थ, इतिहास व लाभ मराठीत जाणा. Read Hanuman Bahuk in Marathi Lyrics, Know meaning, Download free PDF.

श्री हनुमान बाहुक मराठीत | Hanuman Bahuk in Marathi

चौपाई
सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ॥
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित संतत निकट ।
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट (1)
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन ।
उर विसाल भुज दंड चंड नख-वज्रतन ॥
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ॥
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुఁ नहिं आवत निकट (2)
झूलाना
झूलना
पंचमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो ।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो ।
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो (3)
घनाक्षरी
भानुसों पढन हनुमान गे भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो (4)
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलఁग फलाఁग हूतें घाटि नभ तल भो ।
नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो (5)
गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो ।
द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥
संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाఁह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो (6)
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाडैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥
कुंभकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो (7)
दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नंदन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो (8)
दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को ।
पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥
लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को (9)
महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को (10)
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ॥
खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माఁगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुఁ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो (11)
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाఁक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राఁक को ॥
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आఁक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाఁ तहाఁ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाఁक को (12)
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरी किसोर बंदीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाఁक हनुमान की (13)
करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ ।
बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूఁ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ (14)
मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैम् ।
देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैम् ।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैम् ।
बिगरी सఁवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैम् (15)
सवैया
जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तैं आगेहुఁ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो (16)
तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले ।
तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले (17)
सिंधु तरे बडे बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे ।
तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ॥
तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानरबाज ! बढे खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे (18)
अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुंजर केहरि वारो ॥
राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो ।
पाप ते साप ते ताप तिहूఁ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो (19)
घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये ।
सेवा जोग तुलसी कबहुఁ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाఁह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये (20)
बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबंधु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ॥
बडो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये ।
केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाఁह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये (21)
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये ।
राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥
साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाఁधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाఁहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये (22)
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये ।
महाबीर बाఁकुरे बराकी बाఁह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये (23)
लोक परलोकहुఁ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूఁ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये ।
बात तरुमूल बाఁहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये (24)
करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बडी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाఁहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाఁह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी (25)
भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाఁह की ।
करमन कूट की कि जंत्र मंत्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माఁह की ॥
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाఁह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाఁह की (26)
सिंहिका सఁहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बाఁह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है (27)
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की ।
तेरी बाఁह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ॥
साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की (28)
टूकनि को घर घर डोलत कఁगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सఁभार सार अఁजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भांति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है (29)
आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढी है बाఁह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जंत्र मंत्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है (30)
दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाఁकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ॥
एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाఁह पीर की बडी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को (31)
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बडे जीव जेते चेतन अचेत हैम् ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैम् ॥
घोर जंत्र मंत्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैम् ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैम् (32)
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के ।
तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के (33)
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौडी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ॥
अఁबु तू हौं अఁबु चूर, अఁबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाఁह पर लामी लूम फेरिये (34)
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हఁसि हाఁकि फूंकि फौंजै ते उडाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है (35)
सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाఁई सुसाఁई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
बाఁह की बेदन बाఁह पगार पुकारत आरत आनఁद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो (36)
घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाఁति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाఁह गही जो गही समीर डाबरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुఁ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे (37)
पाఁय पीर पेट पीर बाఁह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मी है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दी है ॥
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि ली है ।
कुఁभज के किंकर बिकल बूढे गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूఁ भी है (38)
बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुఁह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है ।
राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दऊउ, जिनके समूह साके जागत जहान है ।
तुलसी सఁभारि ताडका सఁहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है (39)
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माఁगि खात टूक टाक हौम् ।
परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौम् ॥
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौम् ।
तुलसी गुसाఁई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौम् (40)
असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को (41)
जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को ।
तुलसी के दोहूఁ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाఁऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ॥
मो को झूఁटो साఁचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को (42)
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाఁय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै (43)
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मी, बिरची बिरंची सब देखियत दुनिये ॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साఁची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूఁ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये (44)
सियावर रामचंद्र की जय । पवनसुत हनुमान की जय । बोलो भाई सब सनातन की जय । 🙏
Text Size

श्री हनुमान बाहुक मराठीत Audio / Video (Listen & Watch)

श्री हनुमान बाहुक अर्थ | Hanuman Bahuk Meaning

# पाठ (Verse) मराठी अर्थ (Meaning)
चौपाई
1 सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ॥
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित संतत निकट ।
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट (1)
उगवत्या सूर्याप्रमाणे तेजस्वी, समुद्राचे उल्लंघन करून श्री सीतामाईंचा शोक हरण करणारे आणि विशाल बाहू असणाऱ्या श्री हनुमानजींना मी प्रणाम करतो. पवनपुत्र हनुमानजी भक्तांचे सर्व संकट दूर करण्यासाठी सदासर्वदा समीप राहून कृपा करतात.
2 स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन ।
उर विसाल भुज दंड चंड नख-वज्रतन ॥
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ॥
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुఁ नहिं आवत निकट (2)
सुवर्ण पर्वताप्रमाणे भासणारे, कोटी सूर्यांचे तेज असणारे आणि वज्रासारखे दणकट शरीर व नखे असणाऱ्या पवनपुत्राचे ह्दयात ध्यान करणाऱ्या व्यक्तीला स्वप्नातही कोणतेही पाप किंवा दुःख शिवू शकत नाही.
झूलाना
3 झूलना
पंचमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो ।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो ।
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो (3)
पंचमुखी असुरांचा आणि राक्षसी सैन्याचा रणसंग्रामात विनाश करणाऱ्या महावीरा! वेद ज्यांच्या शौर्याचे गुणगान गातात, त्या श्री रघूनाथांच्या महान दूताला सोडून राक्षस सैन्याचा संहार करण्यास दुसरा कोण समर्थ आहे?
घनाक्षरी
4 भानुसों पढन हनुमान गे भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो (4)
सूर्यदेवाकडून विद्या ग्रहण करण्यासाठी आकाशमार्गाने बाललीलेप्रमाणे प्रदक्षिणा मारणाऱ्या हनुमानजींचे अद्भूत पराक्रम पाहून इंद्रादी लोकपाळ, ब्रह्मा, विष्णू व महेश आश्चर्यचकित झाले. हनुमानजी धैर्याचे आणि पराक्रमाचे साक्षात रूप आहेत.
5 भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलఁग फलाఁग हूतें घाटि नभ तल भो ।
नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो (5)
महाभारताच्या युद्धात अर्जुनाच्या रथाच्या ध्वजावर विराजमान होऊन गर्जना करणाऱ्या कपिराजा! त्यांची ती गर्जना ऐकून कौरवांचे सैन्य थरथर कापले. द्रोणाचार्य आणि भीष्म पितामहा यांनी पवनपुत्राच्या बळाची प्रशंसा केली. जगातील सर्व योगी हनुमानजींच्या दर्शनाने धन्य झाले.
6 गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो ।
द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥
संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाఁह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो (6)
समुद्राला गाईच्या पावलाएवढे सहज पार करून लंका लीलया दहन करणाऱ्या! संजीवनी पर्वत हथेलीवर उचलून आणणाऱ्या! रामराज्यातील सर्व विघ्न शमवून लोकपाळांचे रक्षण करणाऱ्या हनुमानजींच्या चरणी तुलसीदास समर्पित आहे.
7 कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाडैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥
कुंभकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो (7)
कूर्मराजाच्या पाठीप्रमाणे सागराला मोजणाऱ्या! कुंभकर्ण आणि रावणासारख्या ढगांना भस्म करणाऱ्या महान अग्नी स्वरूपा! भीष्म पितामह म्हणतात की त्रिकाळ व त्रिलोकात हनुमानजींसारखा दुसरा कोणताही महाबळवान नाही.
8 दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नंदन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो (8)
श्री रामांचे श्रेष्ठ दूत, वायूदेवाचे सुपुत्र, माता अंजनीचे बाळ! सीताजींचे दुःख हरण करणारे आणि लक्ष्मणाला प्राणांपेक्षा प्रिय! तुलसीदासाच्या दारिद्र्य आणि कष्टांतून मुक्ती देणारे महाबळशाली आपणच आहात.
9 दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को ।
पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥
लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को (9)
असुरांचा संहार करून देवांना बंधनमुक्त करणाऱ्या! सर्व पाप-तापांना सकाळच्या सूर्याप्रमाणे हरण करणाऱ्या! तुलसीदासाच्या हृदयात तुमच्याशिवाय दुसरा कोणताही आश्रय नाही. श्री रामांचे लाडके, सर्व मनोकामना पूर्ण करणारे आपण आहात.
10 महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को (10)
महाबळशाली, भीमसेनापेक्षाही अधिक बळ असणाऱ्या! रघुवीराच्या प्रसिद्ध दूता! वज्रासारखे कठीण शरीर आणि करुणाdepicted ह्दय असणाऱ्या! तुलसीदासाच्या शारीरिक हाल अपेष्टा हरण करून रक्षण करा.
11 रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ॥
खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माఁगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुఁ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो (11)
ब्रह्मदेवाप्रमाणे सृष्टीचे निर्माते, विष्णू-शिवाप्रमाणे पालक आणि संहारक, यमालाही जिंकणारे! भक्तांचे संकट हरण करणाऱ्या हनुमानजी, तुलसीदासाच्या सर्व दुःखांचे निवारण करा.
12 सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाఁक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राఁक को ॥
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आఁक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाఁ तहाఁ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाఁक को (12)
जानकीनाथाचे प्रिय सेवक, शिवजींनी पूजलेले नायक! देव आणि दानव तुमच्यासमोर मस्तक झुकवतात. हनुमानजींवर विश्वास ठेवणाऱ्या भक्तावर कोणतेही संकट येत नाही.
13 सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरी किसोर बंदीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाఁक हनुमान की (13)
शिव-पार्वती, लोकपाळ आणि सीता-राम ज्याच्यावर प्रसन्न आहेत, त्या हनुमानजींच्या कृपेने भक्तांना सर्व सिद्धी प्राप्त होतात.
14 करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ ।
बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूఁ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ (14)
करुणेचा सागर, बुद्धी आणि बळाचे निधान! श्री रामांचे प्रियपात्र! मन, वचन आणि कायेने तुलसीदास तुमचा दास आहे, माझे रक्षण करा.
15 मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैम् ।
देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैम् ।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैम् ।
बिगरी सఁवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैम् (15)
असाध्य कामांना साध्य करणाऱ्या कपीश्वरा! देवांना बंदीगृहातून मुक्त करणाऱ्या केसरीनंदना! तुलसीदासाची बिकट स्थिती पाहून कृपादृष्टी करा आणि सर्व कष्ट हरण करा.
सवैया
16 जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तैं आगेहुఁ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो (16)
ज्ञानाचे शिखर हनुमानजी! आपण सदासर्वदा भक्तांच्या हृदयात विराजमान आहात. माझ्याकडून झालेल्या चुका क्षमा करा. तुमच्या दासाचे संकटाच्या वेळी रक्षण करणे तुमचे कर्तव्य आहे.
17 तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले ।
तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले (17)
शिवजींकडूनही शांत न होणारे संकट आपण लीलया हरण करता. तुमच्या नामस्मरणाने सर्व दुःखं तृणासारखी उडून जातात. या कठीण प्रसंगी माझे रक्षण करा.
18 सिंधु तरे बडे बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे ।
तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ॥
तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानरबाज ! बढे खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे (18)
महासागर ओलांडून लंका दहन करणाऱ्या महावीरा! सिंहासारखा शत्रूंचा मर्दन करणाऱ्या! तुमच्या आश्रयाला असलेल्या तुलसीदासाला कसले दुःख?
19 अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुंजर केहरि वारो ॥
राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो ।
पाप ते साप ते ताप तिहूఁ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो (19)
अक्षयकुमाराचा संहार करून रावणाचा गर्व उतरवणाऱ्या! इंद्रजित आणि कुंभकर्णाला भस्म करणाऱ्या अग्नी! पाप, शाप आणि ताप तिन्हींपासून तुलसीदासाचे रक्षण करणारे आपणच आहात.
घनाक्षरी
20 जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये ।
सेवा जोग तुलसी कबहुఁ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाఁह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये (20)
जगद्विख्यात हनुमानजी! तुमच्या सेवक तुलसीदासाच्या अपराधांकडे दुर्लक्ष करून, माझ्या बाहूची असह्य वेदना त्वरित शांत करा.
21 बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबंधु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ॥
बडो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये ।
केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाఁह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये (21)
बालपणापासूनच मला तुमचा दास स्वीकारणाऱ्या दयाळू! घोर कलियुगाच्या तापापासून तुलसीदासाचे रक्षण करून, माझ्या हाताची वेदना राहूसारखी मर्दन करून टाका.
22 उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये ।
राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥
साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाఁधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाఁहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये (22)
सृजन आणि संहाराची शक्ती असणाऱ्या रामदूता! तुलसीदासाच्या मस्तकावर तुमचा अभयहस्त आहे. माझ्या हाताची असह्य वेदना कमळाच्या ताटासारखी मोडून फेकून द्या.
23 राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये ।
महाबीर बाఁकुरे बराकी बाఁह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये (23)
रामाचे प्रेम, लक्ष्मणाचे धैर्य आणि सीताजींच्या भक्तीने कष्ट हरण करणाऱ्या! संजीवनी आणणाऱ्या हनुमानजी, लंकिनीला प्रहार केला तशी माझी वेदना दूर करा.
24 लोक परलोकहुఁ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूఁ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये ।
बात तरुमूल बाఁहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये (24)
त्रिलोकात तुमच्यापेक्षा समर्थ कोणीही नाही. कर्म, काळ आणि लोकपाळ सर्व तुमच्या अधीन आहेत. तुलसीदासाच्या बाहूची वेदना मुळापासून उपटून फेका.
25 करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बडी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाఁहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाఁह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी (25)
कंसासारख्या असुरांनी पूतना पाठवली तशी ही असह्य हातदुखी मला छळत आहे. कृष्णाने पूतनेचा नाश केला तसा हनुमानजी या रोगाचा विनाश करा.
26 भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाఁह की ।
करमन कूट की कि जंत्र मंत्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माఁह की ॥
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाఁह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाఁह की (26)
विधीचे विधान असो, काळाचा प्रभाव असो किंवा मंत्र-तंत्राचा दुष्प्रभाव असो; काहीही असो, हनुमानजींची शपथ आहे, या बाहूची वेदना त्वरित शांत झाली पाहिजे.
27 सिंहिका सఁहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बाఁह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है (27)
सिंहिका, सुरसा आणि लंकिनीला परास्त करणाऱ्या महावीरा! रावणाची अशोकवाटिका उद्ध्वस्त करणाऱ्या! तुलसीदासाच्या बाहूची कठोर वेदना दूर करा.
28 तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की ।
तेरी बाఁह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ॥
साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की (28)
तुमच्या पराक्रमाने इंद्र, सूर्य आणि राहू थरथर कापतात. तुमच्या छत्रछायेत लोकपाळ निर्भय आहेत. तुलसीदासाच्या बाहूची वेदना हरण करण्यात उशीर का?
29 टूकनि को घर घर डोलत कఁगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सఁभार सार अఁजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भांति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है (29)
घरोघरी भिक्षा मागणाऱ्या मला तुमच्या कृपेने पाळून-पोषून मोठे केले. अंजनीकुमारा! तुलसीदासाच्या या तीव्र वेदनेला दूर करून रक्षण करा.
30 आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढी है बाఁह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जंत्र मंत्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है (30)
माझ्या पापांमुळे किंवा शापांमुळे बाहूत असह्य वेदना झाली आहे. अनेक औषधे आणि मंत्र निष्फळ ठरले आहेत. हे रामदूता! तुमचा उशीर मला अतिशय वेदना देत आहे.
31 दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाఁकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ॥
एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाఁह पीर की बडी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को (31)
रामरायाचे दूत, वायूपुत्रा! रावणाला एकाच मुष्टीप्रहाराने मूर्च्छित करणाऱ्या! तुलसीदासाची ही छोटी बाहू वेदना निवारण्यासाठी तुमचा कोप आणि कृपा प्रगट करा.
32 देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बडे जीव जेते चेतन अचेत हैम् ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैम् ॥
घोर जंत्र मंत्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैम् ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैम् (32)
देव, मानव आणि असुर सर्व रामदूताची आज्ञा शिरसावंद्य मानतात. मंत्र-तंत्र आणि रोग हनुमानजींचे नाव ऐकताच पळून जातात. माझे कष्ट दूर करा.
33 तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के ।
तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के (33)
तुमच्या बळाने रामाने रावणाला जिंकले आणि देव निर्भय झाले. तुलसीदासाच्या मस्तकावर अभयहस्त ठेवून तुमच्या दासाचे दुःख शांत करा.
34 पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौडी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ॥
अఁबु तू हौं अఁबु चूर, अఁबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाఁह पर लामी लूम फेरिये (34)
छोट्या चुकांसाठी मला सोडू नका. बाळ रडते तेव्हा आई त्याला छातीशी धरते तसे तुलसीदासाच्या बाहूवर तुमची शेपटी फिरवून वेदना हरण करा.
35 घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हఁसि हाఁकि फूंकि फौंजै ते उडाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है (35)
रोग आणि दुष्ट शक्ती ढगांसारख्या मला वेढून राहिल्या आहेत. करुणानिधान हनुमानजी, तुमच्या हुंकाराने त्यांना उडवून माझे रक्षण करा.
सवैया
36 राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाఁई सुसाఁई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
बाఁह की बेदन बाఁह पगार पुकारत आरत आनఁद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो (36)
रामदास हनुमानजी, माझे आई-वडील समान! माझ्या बाहूच्या असह्य वेदनेची श्री रघुवीराच्या दरबारात विनंती करून माझे रक्षण करा.
घनाक्षरी
37 काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाఁति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाఁह गही जो गही समीर डाबरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुఁ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे (37)
काळाची करालता आणि पापाच्या प्रभावाने बाहूत कठोर वेदना झाली आहे. तुलसीदासरूपी लावलेल्या वृक्षाला सिंचन करून या रोगापासून वाचवा.
38 पाఁय पीर पेट पीर बाఁह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मी है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दी है ॥
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि ली है ।
कुఁभज के किंकर बिकल बूढे गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूఁ भी है (38)
पाय, पोट, हात आणि मुखाच्या वेदनेने शरीर जर्जर झाले आहे. रामनामाचा आश्रय घेतलेल्या मला या व्याधींपासून मुक्त करा.
39 बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुఁह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है ।
राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दऊउ, जिनके समूह साके जागत जहान है ।
तुलसी सఁभारि ताडका सఁहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है (39)
मरीच आणि सुबाहूसारखे रोग माझे मुख आणि हात छळत आहेत. श्री रामनाम जपाने ताडकेचा संहार केला तसा या रोगांना भस्म करा.
40 बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माఁगि खात टूक टाक हौम् ।
परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौम् ॥
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौम् ।
तुलसी गुसाఁई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौम् (40)
बालपणापासून सरळ मनाने रामनाम जपून जगलो आहे. अंजनीकुमाराने मला पावन करून रामकृपेचा पात्र बनवले आहे. गोस्वामीजी, माझे कष्ट हरण करा.
41 असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को (41)
अनाथ तुलसीदासाला रघुनाथाने सनाथ केले. काया, वचन आणि मनाने मी रामाचा दास आहे. माझ्या शरीराची ही वेदना रामकृपेने शांत करा.
42 जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को ।
तुलसी के दोहूఁ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाఁऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ॥
मो को झूఁटो साఁचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को (42)
सीतापतीचा दास बनून जगणे आणि काशीत गंगाकिनारी देहत्याग करणे माझे सौभाग्य आहे. बाहूची ही वेदना केवळ रघुवीरच दूर करू शकतात.
43 सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाఁय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै (43)
सीतापतीचा अभय, हनुमानजींची मदत आणि शिवजींचा उपदेश माझे रक्षकवच आहे. रोग आणि भूतांच्या सागरातून तुलसीदासाला पार करा.
44 कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मी, बिरची बिरंची सब देखियत दुनिये ॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साఁची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूఁ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये (44)
मी हनुमानजी, सज्जन राजाराम आणि शंकरजींना प्रार्थना करतो. माया आणि कर्म रामजींच्या अधीन आहेत. तुमच्याने अशक्य काहीही नाही हे जाणून शांत झालो आहे.

श्री हनुमान बाहुक इतिहास | History

श्री हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदासजींनी रचलेला अत्यंत प्रभावशाली आणि शक्तिशाली स्तोत्र आहे. अशी मान्यता आहे की जेव्हा तुलसीदासजी वात रोग, संधिवात आणि बाहूच्या (हाताच्या) असह्य वेदनेने त्रस्त होते, तेव्हा त्यांनी हनुमानजींच्या स्तुतीत या पाठाची रचना केली होती. या पाठाच्या प्रभावाने त्यांच्या सर्व वेदना त्वरित शांत झाल्या होत्या. म्हणूनच शारीरिक कष्ट आणि रोगांपासून मुक्ती मिळवण्यासाठी हा अचूक उपाय मानला जातो.

परम रक्षणासाठी भक्त श्री हनुमान चालीसा मराठी आणि श्री हनुमान अष्टक मराठी देखील पाठ करतात.

पाठाचे नियम आणि योग्य वेळ | Rules & Time

श्री हनुमान बाहुक हा अत्यंत प्रभावशाली पाठ आहे, त्यामुळे हा करताना काही विशेष नियमांचे पालन करणे आवश्यक आहे:

  • संकल्प: विशेष हेतू किंवा गंभीर संकट आल्यावरच संकल्प घेऊन हा पाठ करावा. विनाकारण किंवा छोट्या-मोठ्या गोष्टींसाठी हा पाठ करणे टाळावे.
  • पवित्रता: पूर्ण शारीरिक आणि मानसिक शुद्धी अनिवार्य आहे. लाल वस्त्र परिधान करणे आणि लाल आसनाचा वापर करणे शुभ मानले जाते.
  • ब्रह्मचर्य: पाठाच्या दिवसांत पूर्ण ब्रह्मचर्याचे पालन करा आणि सात्विक आहारच घ्या.
  • दीपक: पाठाच्या वेळी शुद्ध तुपाचा किंवा चमेलीच्या तेलाचा दिवा प्रज्वलित करावा.

योग्य वेळ: हा पाठ मंगळवार किंवा शनिवारपासून सुरू करणे सर्वात उत्तम मानले जाते. सकाळी किंवा संध्याकाळी अनुकूल वेळी केला जाऊ शकतो, परंतु वेळ आणि स्थान एकच असावे.

श्री हनुमान बाहुक पाठाचे लाभ | Benefits

१) शारीरिक कष्टांतून मुक्ती

श्री हनुमान बाहुक पाठ विशेषतः वात रोग, संधिवात, सांधेदुखी आणि हाताची वेदना शांत करण्यासाठी रामबाण मानला जातो.

२) नकारात्मक शक्तींचा विनाश

या पाठाच्या नियमित वाचनाने भक्ताभोवती दिव्य रक्षा कवच तयार होते आणि दृष्टीदोष व नकारात्मक शक्तींपासून रक्षण होते.

३) संकट निवारण

आयुष्यातील कठीण प्रसंग, अज्ञात भीती आणि मानसिक अशांती दूर करण्यासाठी हे स्तोत्र अत्यंत सहाय्यक ठरते.

४) मनोकामना पूर्ण

श्रद्धा आणि भक्तीपूर्वक केला जाणारा पाठ भक्तांच्या सर्व मनोकामना पूर्ण करतो.

५) भयमुक्त जीवन

कोणत्याही प्रकारची अज्ञात भीती आणि मानसिक ताण दूर करून आत्मविश्वास वाढवतो.

वारंवार विचारले जाणारे प्रश्न | FAQ

आपण रोज श्री हनुमान बाहुक पाठ करू शकतो का?

श्री हनुमान बाहुक अत्यंत उग्र आणि शक्तिशाली पाठ आहे. जेव्हा एखादे मोठे संकट किंवा शारीरिक रोग येतो तेव्हाच हा पाठ करावा. नित्य पूजेसाठी श्री हनुमान चालीसाचा पाठ करणे श्रेष्ठ आहे.

श्री हनुमान बाहुक किती वेळा पाठ करावा?

संकटाच्या वेळी संकल्प घेऊन सतत २१ किंवा ४१ दिवसांपर्यंत पाठ करावा. कठीण परिस्थितीत एकाच बैठकीत ३, ७, ११ किंवा २१ वेळाही पाठ केला जातो.

हनुमान बाहुकमध्ये श्री रामांची शपथ का दिली जाते?

हनुमान बाहुकमध्ये भक्त अत्यंत व्याकुळ होऊन हनुमानजींना त्यांच्या सर्वात प्रिय श्री रामांची शपथ देतो जेणेकरून ते त्वरित येऊन रक्षण करतील.

महिला श्री हनुमान बाहुक पाठ करू शकतात का?

होय, कठीण प्रसंगी महिलासुद्धा शुद्ध मनाने आणि पवित्रतेने श्री हनुमान बाहुक पाठ करू शकतात.

Select Language