श्री पंचमुखी हनुमान कवच हिंदी में | Panchmukhi Hanuman Kavach in Hindi
हिंदी में संपूर्ण पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ करें। कवच के संस्कृत श्लोक, हिंदी अर्थ, पाठ विधि, नियम और इसके अद्भुत लाभों के बारे में विस्तार से जानें (Panchmukhi Hanuman Kavach Lyrics & Meaning in Hindi).
श्री पंचमुखी हनुमान कवच | Panchamukhi Hanuman Kavach in Hindi
| विनियोगः – गायत्री छंदः |
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ॐ अस्य श्री पंचमुख हनुमन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः
पंचमुख विराट हनुमान देवता। ह्रीं बीजम् । श्रीं शक्तिः। क्रौ कीलकम्। क्रूं कवचम् । क्रै अस्त्राय फ़ट्। इति दिग्बंधः । |
| ॥ श्री गरुड़ उवाच - अथ ध्यानम् ॥ |
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अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वांगसुंदर ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम् ॥ १ ॥ |
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पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम् ॥ २ ॥ |
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पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम् ॥ ३ ॥ |
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अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् ।
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ॥ ४ ॥ |
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पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम् ।
सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ॥ ५ ॥ |
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उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम् ।
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ॥ ६ ॥ |
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ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् ।
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ॥ ७ ॥ जघान शरणं तस्मात् सर्वशत्रुहरं परम् । ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ॥ ८ ॥ |
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खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम् ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ॥ ९ ॥ भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम् । एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ॥ १० ॥ |
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प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ |
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पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम् ।
पीताम्बरादिमुकुटै रूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥ १२ ॥ |
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मर्कतेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् ।
शत्रुं संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥ १३ ॥ |
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ॐ हरिमर्कट मर्कट मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता ॥ ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ॥ १४ ॥ |
| ॥ पंचमुख मन्त्राः ॥ |
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१. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा ।
२. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा । ३. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा । ४. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा । ५. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा ॥ |
| ॥ करन्यासः एवं अङ्गन्यासः ॥ |
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॥ अथ करन्यासः ॥
ओं अञ्जनीसुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः । ओं वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः । ओं अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः । ओं रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं पञ्चमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ अथ अङ्गन्यासः ॥ ओं अञ्जनीसुताय हृदयाय नमः । ओं रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा । ओं वायुपुत्राय शिखायै वषट् । ओं अग्निगर्भाय कवचाय हुम् । ओं रामदूताय नेत्रत्रयाय बौषट् । ओं पञ्चमुखहनुमते अस्त्राय फट् । पञ्चमुखहनुमते स्वाहा इति दिग्बन्धः ॥ |
| ॥ मुख्य कवच मन्त्र एवं बीजाक्षर ॥ |
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ॐ श्रीरामदूताय आञ्जनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्रमाय सीतादुःखनिवारणाय लङ्कादहनाय मारुतिरुद्रात्मकाय हुं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बम्बम्बम्बम्बं वौषट् स्वाहा (अग्नि स्तंभन) । ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फम्फम्फम्फम्फं फट् स्वाहा (रोग नाश) । ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेङ्खेङ्खेङ्खेङ्खें मारणाय स्वाहा (शत्रु मारण) । ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा (संपत्ति आकर्षण) । ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धन्धन्धन्धन्धं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा (शत्रु स्तंभन) । ॐ टण्टण्टण्टण्टं कूर्ममूर्तये परयन्त्र परतन्त्रोच्चाटनाय स्वाहा ॥ (परतंत्र उच्चाटन) |
| ॥ फलश्रुतिः ॥ |
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इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत् स्तोत्रम् सर्वशत्रुनिवारणम् । द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् । त्रिवारं तु पठेन्नित्यं सर्वसंपत्करं शुभम् । चतुर্বারं पठेन्नित्यं सर्वरोग निवारणम् । पंचबारं पठेन्नित्यं सर्वलोक वशङ्करम् । षड्बारं पठेन्नित्यं सर्वदेव वशङ्करम् । सप्तबारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् । अष्टबारं पठेन्नित्यं इष्टकामार्थसिद्धिदम् । नबबारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्नुयात् । दशबारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानवर्धनम् । एकदशबारं जपेन्नित्यं सर्वसिद्धि मवाप्नुयात् ॥ |
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पंचमुखी हनुमान कवच हिंदी अर्थ एवं व्याख्या | Panchamukhi Hanuman Kavach Meaning in Hindi
| सं. | श्लोक / मन्त्र | हिंदी अर्थ एवं संपूर्ण व्याख्या |
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| विनियोग | ॐ अस्य श्री पंचमुख हनुमन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः पंचमुख विराट हनुमान देवता। ह्रीं बीजम् । श्रीं शक्ति:। क्रौ कीलकम्। क्रूं कवचम् । क्रै अस्त्राय फट्। इति दिग्बंधः ॥ | इस पंचमुख हनुमत कवच स्तोत्र के ऋषि ब्रह्मा जी हैं, छंद गायत्री है, देवता पंचमुख विराट हनुमान जी हैं, ह्रीं बीज मंत्र है, श्रीं शक्ति है, क्रौं कीलक है, क्रूं कवच है और 'क्रैं अस्त्राय फट्' मंत्र दसों दिशाओं का दिग्बंध (सुरक्षा घेरा) है। |
| १ |
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रुणु सर्वांगसुंदर । यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमत्: प्रियम् ॥ |
श्री गरुड़ जी कहते हैं— हे सर्वांग सुंदर पक्षीराज/साधक! देवाधिदेव भगवान शिव द्वारा रचित और श्री हनुमान जी को अत्यंत प्रिय ध्यान स्तोत्र का अब मैं वर्णन करता हूँ, इसे ध्यानपूर्वक सुनो। |
| २ |
पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् । बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम् ॥ |
भगवान पंचमुखी हनुमान जी के ५ विशाल मुख हैं, १५ (तीन गुणा पांच) दिव्य नेत्र हैं और १० विशाल भुजाएं हैं। वे साधक के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाले हैं। |
| ३ |
पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् । दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम् ॥ |
पूर्व मुख (वानर रूप): इनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान प्रचंड है। इनके तीखे भयानक दांत, उग्र मुख और टेढ़ी भौंहें शत्रुओं के कुल का संहार करने वाली हैं। |
| ४ |
अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् । अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ॥ |
दक्षिण मुख (नृसिंह रूप): अत्यंत अद्भुत, दिव्य और अति-उग्र तेजयुक्त है। यह शत्रुओं के लिए अत्यंत भीषण दिखता है, परंतु साधकों के सभी भय, भूत-प्रेत और मानसिक विकारों का नाश करता है। |
| ५ |
पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम् । सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ॥ |
पश्चिम मुख (गरुड़ रूप): मुड़ी हुई चोंच वाला अत्यंत बलशाली एवं सामर्थ्यशाली रूप है। यह सभी सर्प दोष (नाग बाधा), विष प्रभाव, कुदृष्टि और भूत-प्रेत का शमन करता है। |
| ६ |
उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम् । पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ॥ |
उत्तर मुख (वराह रूप): काले आकाश के समान कांतिमान और दीप्तिमान है। यह पाताल लोक की नकारात्मक शक्तियों, वेताल, ज्वर, असाध्य बीमारियों और शारीरिक कष्टों को दूर करता है। |
| ७-८ |
ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् । येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ॥ जघान शरणं तस्मात् सर्वशत्रुहरं परम् । ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ॥ |
ऊर्ध्व मुख (हयग्रीव/अश्व रूप): घोड़े के मुख वाला घोर तेजस्वी रूप है जो दानवों का नाश करने वाला है। इसी रूप से तारकासुर महादैत्य का वध हुआ था। दयानिधि रुद्र रूप हनुमान जी सभी शत्रुओं का नाश करने वाले परम शरण्य रक्षक हैं। |
| ९-१० |
खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम् । मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ॥ भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम् । एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ॥ |
भगवान हनुमान जी अपनी १० भुजाओं में तलवार, त्रिशूल, खट्वांग, पाश, अंकुश, पर्वत, मुष्टि (मुक्का अस्त्र), कौमोदकी गदा, वृक्ष, कमंडलु, भिंदिपाल (लोहे का अस्त्र) तथा १०वीं ज्ञानमुद्रा धारण किए हुए हैं। ऐसे सर्वायुधधारी भगवान को मैं भजता हूँ। |
| ११ |
प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम् । दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम् ॥ |
श्री हनुमान जी प्रेतासन पर विराजमान हैं, समस्त दिव्य आभूषणों से भूषित हैं। उन्होंने दिव्य मालाएं, पीतांबर और आकाशसम सुगंधित लेप धारण कर रखा है जो समस्त बाधाओं को दूर करने वाला है। |
| १२ |
पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम् । पीताम्बरादिमुकुटै रूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ॥ |
पांच मुख वाले (पञ्चास्य), अच्युत, अनेक अद्भुत वर्णयुक्त मुख वाले, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले कपिश्रेष्ठ हनुमान जी का हम ध्यान करते हैं। जो पीतांबर व मुकुट से सुशोभित हैं, उन पििंगलाक्ष भगवान का हम मन से स्मरण करते हैं। |
| १३ |
मर्कतेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् । शत्रुं संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ॥ |
हे कपिश्रेष्ठ! प्रचंड उत्साही एवं महापराक्रमी हनुमान जी! आप सर्व शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। हे श्रीमन् पंचमुख-हनुमान जी! मेरे शत्रुओं का संहार कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए और संकटों से मेरा उद्धार कीजिए। |
| १४ |
ॐ हरिमर्कट मर्कट मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले । यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता ॥ ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ॥ |
महाप्राण हनुमान जी के बाएँ पैर के तलवे पर 'ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा' मंत्र का स्मरण करने से केवल शत्रु ही नहीं, बल्कि शत्रु के पूरे कुल का नाश हो जाता है। हनुमान जी समस्त तमोगुणी वृत्तियों को समूल नष्ट कर देते हैं। |
| मंत्र |
पंचमुख मन्त्राः: १. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा । २. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा । ३. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा । ४. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा । ५. ॐ नमो भगवते पंचवदनाय ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा ॥ |
५ दिशाओं के मुखों का अर्थ: • पूर्व मुख (वानर): सकल शत्रुओं का संहार करने वाले कपिमुख को नमन। • दक्षिण मुख (नृसिंह): भय एवं समस्त भूतों का उच्छेद करने वाले करालमुख नृसिंह को नमन। • पश्चिम मुख (गरुड़): सर्व प्रकार के विष एवं नाग दोष का हरण करने वाले गरुड़ानन को नमन। • उत्तर मुख (वराह): सर्व संपत्ति व समृद्धि प्रदान करने वाले आदिवराह को नमन। • ऊर्ध्व मुख (हयग्रीव): सर्व जनों को वशीभूत व आकर्षित करने वाले हयग्रीव (अश्वमुख) को नमन। |
| न्यास |
करन्यासः एवं अङ्गन्यासः: करन्यास में अंगूठे से लेकर दोनों हथेलियों तक हनुमान जी के दिव्य स्वरूपों का स्मरण किया जाता है। अङ्गन्यास में हृदय, शिर, शिखा, कवच, तीनों नेत्रों और अस्त्र द्वारा दसों दिशाओं का रक्षा बंधन किया जाता है। |
करन्यास और अंगन्यास के द्वारा साधक अपने शरीर की सभी दसों दिशाओं, इंद्रियों और मन-मस्तिष्क में पंचमुखी हनुमान जी की दिव्य ऊर्जा की स्थापना करता है, जिससे कोई भी नकारात्मक शक्ति शरीर को स्पर्श नहीं कर सकती। |
| बीजाक्षर |
मुख्य कवच मन्त्र व बीजाक्षर: ॐ श्रीरामदूताय आञ्जनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्रमाय... ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बम्बम्बम्बम्बं वौषट् स्वाहा । (अग्नि स्तंभन) ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फम्फम्फम्फम्फं फट् स्वाहा । (रोग नाश) ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेङ्खेङ्खेङ्खेङ्खें मारणाय स्वाहा । (शत्रु मारण) ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा । (संपत्ति आकर्षण) ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धन्धन्धन्धन्धं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा । (शत्रु स्तंभन) ॐ टण्टण्टण्टण्टं कूर्ममूर्तये परयन्त्र परतन्त्रोच्चाटनाय स्वाहा ॥ (परतंत्र उच्चाटन) |
यह मुख्य संपुटित बीजाक्षर मन्त्र है। यह मन्त्र शत्रु स्तंभन (शत्रुओं को निष्क्रिय करना), परतंत्र उच्चाटन (दूसरों द्वारा कराए गए टोने-टोटके और तांत्रिक अभिचार को दूर भगाना), रोग नाश और असीम संपत्ति के आकर्षण का अमोघ बीजाक्षर है। |
| १५-२१ |
फलश्रुतिः (पाठ संख्या का सुफल): इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः । एकवारं जपेत् स्तोत्रम् सर्वशत्रुनिवारणम्... ॥ |
फलश्रुति अर्थ (पाठ आवृत्ति फल): • १ बार पाठ: समस्त शत्रुओं से मुक्ति। • २ बार पाठ: पुत्र-पौत्र व वंश की वृद्धि। • ३ बार पाठ: सर्व संपत्ति और मंगलकारी लाभ। • ४ बार पाठ: समस्त शारीरिक रोगों व व्याधियों का निवारण। • ५ बार पाठ: सर्व लोक वशीकरण एवं सम्मोहन। • ६ बार पाठ: सर्व देवों की कृपा प्राप्ति। • ७ बार पाठ: सर्व सौभाग्य एवं समृद्धि प्राप्ति। • ८ बार पाठ: समस्त मनोकामनाओं (इष्टकाम) की सिद्धि। • ९ बार पाठ: राजयोग एवं सर्व सुख-भोग। • १० बार पाठ: तीनों लोकों का ज्ञान एवं परम सिद्धि। • रुद्रावृत्ति (११ या २१ बार): निश्चित रूप से सर्व सिद्धियाँ सिद्ध होती हैं। निर्बल व रोगी मनुष्य कवच स्मरण से महाबल प्राप्त करता है। |
पंचमुखी हनुमान कवच का इतिहास एवं उत्पत्ति | History
पौराणिक मान्यताओं और रामायण कथा के अनुसार, पंचमुखी हनुमान अवतार का प्रकटीकरण रामायण युद्ध के दौरान हुआ था। जब लंकापति रावण का भाई अहिरावण छद्म वेश धारण करके श्रीराम और भ्राता लक्ष्मण को मूर्छित कर पाताल लोक ले गया, तब भगवान हनुमान उन्हें मुक्त कराने पाताल लोक पहुंचे।
अहिरावण की शक्ति ५ दिशाओं में जल रहे ५ दीपक थे। यदि ५ दिशाओं के दीयों को एक साथ बुझाया जाता, तभी अहिरावण का वध संभव था। तब हनुमान जी ने पूर्व में वानर, दक्षिण में नृसिंह, पश्चिम में गरुड़, उत्तर में वराह और ऊर्ध्व में हयग्रीव—इन ५ मुखों को धारण करके एक साथ पांचों दीपकों को बुझाया और अहिरावण का वध कर श्रीराम-लक्ष्मण को पाताल लोक से सुरक्षित मुक्त कराया। इसी पराक्रमी रूप की रक्षात्मक शक्ति को पंचमुखी हनुमान कवच के रूप में पूजा जाता है।
पंचमुखी हनुमान कवच के मुख्य लाभ एवं महिमा | Benefits
१. शत्रु एवं षड्यंत्रों से पूर्ण सुरक्षा
यदि कोई शत्रु आपको समाज में नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा है या आपके कार्यक्षेत्र में षड्यंत्र रच रहा है, तो पंचमुखी हनुमान कवच का नियमित पाठ शत्रुओं के सभी वार विफल कर देता है।
२. तंत्र-मंत्र एवं बुरी नजर से मुक्ति
यदि किसी व्यक्ति पर काला जादू, टोना-टोटका, नजर दोष या भूत-प्रेत का साया हो, तो इस कवच का पाठ करने और हनुमान लॉकेट/यंत्र धारण करने से नकारात्मक ऊर्जा तुरंत नष्ट हो जाती है।
३. शनि ग्रह दोष एवं मुकदमों से राहत
शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या उग्र ग्रह दोषों के कारण जीवन में चल रहे संघर्ष, झूठे आरोपों और कोर्ट-कचहरी के मुकदमों से मुक्ति पाने के लिए पंचमुखी हनुमान कवच अमोघ उपाय है।
४. ५ दिव्य देव स्वरूपों का आशीर्वाद
इस कवच में हनुमान जी, नरसिंह जी, गरुड़ जी, वराह जी और हयग्रीव जी के ५ पावन रूपों का स्मरण है, जिससे साधक को एक साथ बल, बुद्धि, आरोग्य, धन और ज्ञान प्राप्त होता है।
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Download PDF (Hindi)पंचमुखी हनुमान कवच पाठ की विधि एवं नियम | Vidhi & Rules
१. सही समय एवं दिन
मंगलवार और शनिवार का दिन इस पाठ के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्या समय लाल वस्त्र पहनकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
२. पूजन सामग्री एवं दीपक
पाठ से पूर्व लाल आसन बिछाएं, श्री हनुमान जी के पंचमुखी चित्र के समक्ष चमेली के तेल का दीपक या शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करें और सिंदूर, गुड़-चना अर्पित करें।
३. संकल्प एवं माला जप
विशेष संकट के निवारण हेतु हाथ में जल लेकर संकल्प लें। २१ या ४१ दिनों तक लगातार १, ३, या ११ बार कवच का पाठ करें। पाठ के बाद हनुमान चालीसा अवश्य पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्र. पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ कब करना चाहिए?
उ. पंचमुखी हनुमान कवच का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, परंतु मंगलवार और शनिवार को इसका विशेष फल मिलता है। जब भी आप पर कोई भारी संकट, बीमारी या शत्रु बाधा आए, तब संकल्प लेकर इसका पाठ करना चाहिए।
प्र. पंचमुखी हनुमान जी के ५ मुखों का क्या अर्थ है?
उ. १. पूर्व मुख (वानर) – शत्रु नाश, २. दक्षिण मुख (नरसिंह) – भय मुक्ति, ३. पश्चिम मुख (गरुड़) – विष व सर्प दोष नाश, ४. उत्तर मुख (वराह) – धन व आरोग्य, ५. ऊर्ध्व मुख (हयग्रीव) – ज्ञान व मनोकामना सिद्धि।
प्र. क्या इस कवच का पाठ करने से शनि की ढैय्या और साढ़ेसाती दूर होती है?
उ. हाँ, पंचमुखी हनुमान कवच शनिदेव के प्रकोप और साढ़ेसाती के कष्टों को शांत करने में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होता है।
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